पहेली
देखा जो मुस्कुरा के मुझे मेरे रकीब ने
लो दोस्त सा लगने लगा दुश्मन करीब से
नफरत की आग में कितने जल रहे थे हम
पकड़ा जो उसने हाथ तो नदिया से बह गए
बददुआये सारी दुआ में बदल गयी
अब जाके हमने जाना ,दिल की नियत खराब थी
ना जाने कब से कर रहा था उनका ही इंतज़ार
ना पाने पर कहता था उन्हें दुश्मन है मेरा यार
आते ही उनके दिल की तबियत संभल गयी
वो ही मेरी किस्मत है चाहत वो ही मेरी
एक पल में ये उलझी सी पहेली सुलझ गयी
मैं बाद मुद्दतो के इंसान में बदल गयी
शिखा नारी
