तबाही
जब गम के एहसासों से बन जाते है ,
गहरे बादल तो बरस लेती हू ,
एक बदली ही तो हू ,खुद को तड़पने की सजा देती हू
जो बरसती हू कभी दर्द से घायल हो के ,
तो तूफान भी कदमो में सर झुकाते है
अगर तड़प उठता है ये दिल मेरा ,
मचल जाती हू और मैं ,जब रोते रोते
मेरे आंसू भी जब दर्द की नदी से मिल जाते है ,
दिल की बस्ती में बाढ़ आती है
ये तबाही बेपनाह मचाते है ,
हम खुद ,खुद से हार जाते है
टूटे सपनो की अपनी लाशो को फिर से ,
उनकी कब्रों मैं हम दबाते है।
shikhanaari
जब गम के एहसासों से बन जाते है ,
गहरे बादल तो बरस लेती हू ,
एक बदली ही तो हू ,खुद को तड़पने की सजा देती हू
जो बरसती हू कभी दर्द से घायल हो के ,
तो तूफान भी कदमो में सर झुकाते है
अगर तड़प उठता है ये दिल मेरा ,
मचल जाती हू और मैं ,जब रोते रोते
मेरे आंसू भी जब दर्द की नदी से मिल जाते है ,
दिल की बस्ती में बाढ़ आती है
ये तबाही बेपनाह मचाते है ,
हम खुद ,खुद से हार जाते है
टूटे सपनो की अपनी लाशो को फिर से ,
उनकी कब्रों मैं हम दबाते है।
shikhanaari
