बहुत मैं थक गयी हूँ
बहुत मैं थक गयी हूँ
बहुत मैं थक गयी हूँ
बहुत मैं थक गयी हूँ बहुत विश्वास था
पर वक़्त से छल गयी हूँ
तुम्हारी आरज़ू में भटकती जा रही हूँ
अजनबी रास्तो पर ठोकरे खा रही हूँ
बहुत टुकड़े हैं दिल के
कहाँ तक मैं सम्भालूँ ?
भार सांसो का बहुत है क्यों खुद पर बोझ डालूँ ?
दिल के टूटे ये टुकड़े फेंकती जा रही हूँ
रौशनी बुझ रही है आस बाकि नही है
चौराहो में भटक कर मन्ज़िले खो चुकी हूँ
रात का है अँधेरा रात काली बहुत है
हर तरफ बेबसी है दूर जलता दिया है
क्यों ???अब तक जल रहा है कदम जख्मी है मेरे
और धूमिल रौशनी है
ना कुछ पाने की आशा ना कुछ खोने को बाकि
हाथ खली है अब तक क्यों?कुछ ना पा सकी हूँ
सभी रिश्ते निभाए ....... पर तुम को पा ना पाए
इतना तरसी हूँ साजन की
तुम्हे पाने की छोड़ो मैं खुद को पा ना पायी
मैं खुद को भूल आयी