अमराई
मैं अगर कहू फिर दिल खो बैठी क्या मान सकेगी ये दुनिया ?
फिर प्यार किसी से कर बैठी क्या ?समझ सकेगी ये दुनिया
एक पहर बीत गयी जीवन की एक उम्र गुज़ारी तन्हा ही ,
और अब पतझड़ के मौसम में मुझे प्यार हुआ है साजन जी
वो ठहरी सी प्यारी आंखे वो मुस्कानों से सजे अधर ,
कितनी सच्चाई दिखती है तेरी बातो में अजनबी सजन
मेरे मन के प्रेम महल में बड़ी तबाही आयी थी
हर अहसास मेरा झुलसा सा था जो बचा ,सिर्फ तन्हाई थी
पर अब जाना उस लावे में जो जल न सकी, अमराई थी,
और प्रेम वृष्टि की बूंदो से फिर यहाँ बहारे आयी थी
फिर अमराई में प्रेम बौर आच्छादित थी हर पोर- पोर,
फिर मन्द सुवासित सरल सहज खुशबु मेरे तन- मन पर छायी थी ,
मेरे वो सरल सांवरे भोले साजन इस अमराई के माली है ,
अब फिर खिल उठी कली एक जो तन्हा और मुरझाई थी ,
उनकी बाहो में सांस मिली जीवन की खोयी आस मिली
उस अमराई की छाया में जीवन को फिर एक अर्थ मिला ,
वो मेरे है मैं बस उनकी जीवन को जीवित हूँ !ये अहसास मिला,
मुझको मिला सजन मेरा राधा को कान्हा का रास मिला
अब उम्र की इस बेला में मीरा को कृष्ण मिला उसका,
अब राधा मीरा और कृष्णा ये मुरली और सारी तृष्णा,
सब शांत सरल न हृदय विकल, मेरा भी है कोई सजना।
