मैं कैसे बुझने दू प्रकाश दीप
अपने साजन के आंगन का
वह फूल जो वृक्ष को विस्मृत है ,
आंसू है टूटी डालो का
बोया मैंने ना सीचा ही ,
मैंने यूँही बस पाया है
है प्यार मुझे हर पत्थर से
जिस पर साजन का साया है
खिलते देखा बढ़ते देखा ,
उसकी खुशबु पाने को
साजन को,, अपने कांटो पर चलते देखा
किस्मत का खेल कहू इसको ,
या पूर्वजन्म की माया है ,
अपनी सौतन के आँचल से गिरते,
इन फूलो को अपने अंचल में छुपाया है
सौतेली हूँ !पर माँ हूँ ना ,
ईश्वर ने ये, रिश्ता भी अजब बनाया है
मैंने इन कोमल फूलो को अपने अंग लगाया है
ना भी मिले खुशबु इनकी ,पर साजन का घर तो महकाया है
अनजाने ही सब भूल गए ये घर जो महक रहा है फूलो से
इन पर मेरा अक्स भी आया है
ये घर तो अब मेरा भी सरमाया है
