जज्बा
झीना सा अहसासों का परदा
इस पार अगन उस पार पवन ,
स्मृतियों की ज्वालायें कैंसे न बनेगी दावानल
कैसे ना जलेंगे तन और मन,
कैंसे ना जलेगी एक बिरहन
तुम चाहो तो बरसो हम पर,
बन कर बरखा अजनबी सजन
बुझ जो गए तो राख बचेगी ,
जल जो गए तो खाख बचेगी
मुश्किल है नामुमकिन भी ,
बन जाए लाशे फिर दुल्हन
बन जाए लाशे फिर दुल्हन
जली हुयी बगिया कोई
बन जाए फिर से हँसता गुलशन
बन जाए फिर से हँसता गुलशन
इतना सा अहसान करो ,
प्रेम नीर का मान करो
लाखो पौधे है गुलशन में ,
किसी और पे ये जल दान करो
मुझ को बस जलने दो तन्हा ,
इस जज्बे का तुममान करो ।
shikhanari
shikhanari
