मनमयूर
स्मृतियों के जुगनुओ से रातो को रोशन किया
झिलमिलाते चाँद तारे और दूधिया सी चंदनिया
आज उनकी बात सुन के खोली दिल की खिड़किया
है नज़ारा खूबसूरत नाचती है बिजलिया
बारिशो की रिमझिमें भी कोयलो की कुहुक भी
हर तरफ शीतल पवन और फूलो की मीठी महक भी
मन का मयूर आज जाने क्यों मेरे बस में नहीं
नृत्य इसका देख कर मेरी उदासी हंस पड़ी
छीन तो ली तुमने मुझसे मेरी ये महरूमिया
अब बताओ साथ मेरा दे सकोगे तुम कितना भला
फिर कही खिड़की ये मन की दुःख से तो भर ना जाएगी
इसके दरवाज़ों पे फिर से मौत स्वप्नों की तो ना हो जाएगी
क्या यूँही मनमीत के संग मनमयूर की होंगी अठखेलियाँ
अब मेरे जीवन में बरसो लम्बी रात फिर तो ना आयेगी
