क़द्र
अनगिनत चोटे और आहों पे पाबंदी भी
मुझसे ही पर्दादारी फिर मुझसे ही ,रजामंदी भी,
पहले खुद मेरा क़त्ल किया फिर मातम में, बेहोश हुए
तुम पहले ऐसे क़ातिल हो जो शब्दों से ही, मार गए ,
हम हाथ न रख पाए दिल पर तुम चाक जिगर कर ,चले गए
लहू नहीं निकला मेरा लकिन सीने से सब अहसास गए ,
साँसे तो अब भी बाकि है पर जिन्दा ही हम कहाँ रहे
ना चिता जली न हवन हुआ पर कब्र बनी अहसासों की,
उस क़ब्र पे भी तुम्ही आये हर शाम लिए सौगाते भी
आखिर मैं कैसे समझू की मैं जीती हूँ या चली गयी,
तुम बोलो आशिक़ हो मेरे या तुमको मेरी क़द्र नहीं
ऐसे कैसे हम जी पाए जब जीने का अहसास नहीं।
