ढूंढेगे हम लम्हा -लम्हा टूटे सपने फिर सहला कर
लो फिर बुन ली एक कविता हमने, यादो को पिघला कर,
कड़ियों को किस्मतो की जोड़ा लो फिर तुमसे, नज़र मिला कर
फिर मैं रुठु मुझे मानना फिर सपनो में आना- जाना,
ना पाया ना खो पाएंगे सपनो में हम, मिल जायेंगे
सुन लो लोगो ध्यान लगाना हमको कोई नहीं जगाना,
नीद मिटी तो स्वप्न मिटेगा मेरा उनसे, ध्यान हटेगा
वो भी ओझल हो जायेंगे सौ पर्दो में खो जायेंगे,
ना खुद हंस कर हमे रुलाना बंद ना हो, साँसों का आना
नयी मंजिले नए ठिकाने ना मिलने के, लाख बहाने,
पर मेरे सपनो की दुनिया साजन नहीं जला पाओगे
जब हम चाहे तुम आओगे जब हम चाहे तब जाओगे,
नहीं हक़ीक़त मगर फर्क क्या आखिर मेरे हो जाओगे
हम बंद करेंगे आंखे चिर निंद्रा में सो जायेंगे,
बोलो कैसे क़ैद से मेरी सजना तुम मुक्ति पाओगे।
