वाह री किस्मत
वाह री किस्मत! तेरे भी करिश्मो को सज़दा है
रखे थे कई रंग मेरे लिए तूने भी ,सिर्फ हमसे मुहब्बत की
ना जज़्बातो की परवाह की ना अहसासों की इज़्ज़त ही ,
जहाँ मर्जी वहाँ मंजिल जहाँ मर्ज़ी कश्ती डुबो डाली ,
मसीहा जिसको समझा, वो भी हमी से खेल ने आया
जिसे समझा फ़क्त दुश्मन वो हम पे जान लूटा आया ,
ये देखो मासूमियत हमारे अपने ,इस दिल की
ये भी, हमी को लूट के ,दुश्मन के दिल से दिल लगा आया ,
हम अब भी फ़र्क़ न समझे,इश्क़ और बेवफाई में
उसी से इश्क़ कर बैठे जो मेरा हर खत जला आया
शिखानारी
