वफ़ा
अनुभवों के फूलों को अपने सूखा के
जिंदगी की शक्ल को ज़रा, गुलज़ार कर दू ,
नाइत्तिफ़ाक़ी, नफरत और ये नाकाम रिश्ते
गजीदा दर्द से, दिल को ज़रा गम़गुस्सार कर दू ,
गुज़ारिश है आप भी अब गुफ्तगू का ले सहारा
मैं अलफ़ाज़ो से ही इन नफरतो की मांग, भर दू ,
आब-ए-आईना तो नहीं थी कभी अपनी मुहब्बत
चलो अश्क़ो से ही इसमें वफ़ा की ताब भर दू।
शिखानारी
