माँ गंगा नमो नमः
लो देखो गर्जना करती ये गंगा सर पे आ बैठी
मेरे शंभु के केशो में उलझ कर घर बना बैठी ,
कोप शंकर का शीतल कर वही मस्तक पे रहती है
ये माँ गंगे एक पल में सैकड़ो पाप धोती है ,
तो फिर क्यों आज विधना माँ गंगे से कुपित है
क्यों सारी वेदना सह के ये गंगा यूँ व्यथित है,
मोक्ष की प्राप्ति दो बून्द जल गंगा का ही है
तो फिर ये पावन जल आज इतना अशुद्ध क्यों है ,
इससे पीने में मानव मन इतना विरक्त क्यों है
मेरी माता के चरणों में क्यों इतनी गंदगी है ,
अपनी माता से ही क्या हम बच्चो की कोई दुश्मनी है
वो जल जो बून्द मुक्ति की माना गया है ,
आज हर बून्द में उसकी क्यों इतनी बेबसी है
क्या यही बदले में माँ के प्रेम की अदायगी है।
शिखानारी
