सूना दरीचा।
ना दीपक ना बाती ,ना चंदा ना तारे
ना राहे ना साथी, न गुल है ना खुशबु,
बढ़ती रही जिंदगी की लताये
यूँही सालो से खुद ही यूँही बेसहारे ,
सालो से बंजर है दिल ये की धरती
ना बारिश न पानी न कोई कहानी ,
मगर फिर भी सोंधी सी खुशबु फ़िज़ा में
न जाने कैसे कहा से है हर रोज़ आती ,
ये दीपक जला है ये दर अधखुला है
कोई भी परछाई नज़र तक ना आती,
मगर दिल के दरवाज़े पे कोई दस्तक
मुझे हर समय क्यों जगाती,
कही ये मुक्ति की घड़ी तो नहीं है
इंतज़ार में जिंदगी के मौत तो ये नहीं ,
चलो कोई तो मेरे घर में आया
बरसो से सूना पड़ा था मेरा दरीचा।
शिखानारी
शिखानारी
