दिल का पंछी
कितना बोली थी मैं उनसे
हो पायेगा प्रेम ना हमसे
फिर भी तुमने तीर चलाया
दिल पंछी को मार गिराया
कितना भोला भाला सा था
सौं पर्दो में चुप बैठा था
नादानी में जोश में आया
पी कर मदिरा कुछ वादों की
अपना पूरा होश गवांया
फिर पागल ने पंख पसारे
स्वप्नो से परवाज़ निखारे
स्वप्नो से परवाज़ निखारे
एक उड़ान भी भर ना पाया
शातिर प्रेम शिकारी ने
बिलकुल सीधा बाण चलाया
दिल का पंछी भोला भाला
सारे स्वप्ने हाथ से छूटे
सारे स्वप्ने हाथ से छूटे
सीधा नभ से गिरा आवारा
उड़ गए उसके प्राण पखेरू
यही इश्क़ में उसने पाया
शिखानारी
