खंजर
बड़ी अजीब फ़िज़ां है धुएँ में जहर मिला है
नफरते हवा में गुम हैं सांस में सिर्फ नशा है,
कौन दुश्मन है यहाँ दोस्त भी, कौन यहाँ है
हर कोई किसी अनजाने से जालों में फसा है,
उफ़ ये दर्द दिल का जख्म गहरा बड़ा है
उसी ने मारा है खंजर जो कभी दोस्त रहा है,
हम सह भी ले ये दर्द तो फिर देखिये आलम
बेवफाई का खंजर कसम से तेज़ बड़ा है ,
वार पर वार मेरे दिल पे हंस- हंस के वो करने लगा है
ना याद उनको मेरी वफ़ा मुहब्बत न अपनी महरूमियाँ,
याद बस शख्स एक, जो मेरी उल्फत से रार करता रहा है
अपने महल के सामने मेरे दिल का टुटा सा मकां ,
जिसपे वह तंज मेरे सामने उनसे करता रहा है
मेरा साथी ये मकां छोड़ कर महलो में गया है,
मेरा ये जख्मी दिल उनकी फिर भी
उन की खुशियों की दुआ पढ़ता रहा है ,
देखो ना मुहब्बत ने उन्हें माफ़ किया है।
शिखा नारी
