बोझ
जीवन पर एक निबंध लिखू
या दिल की बाते चंद लिखू
वैसे तो लाख फ़साने है पर
कह दू तो तुम पर ग्रन्थ लिखू
इतना आसान नहीं है पर
शब्दों में तुमको बाँध सकू
सारी मर्यादा पार करू
तब जा के तुम को बांच सकूँ
दो तीन नहीं पुरे सौ होंगे
अध्याय तुम्हारे कर्मो के
कितनी बारी ही हनन किये
तुमने मानव के धर्मो के
बचपन से चलो शुरू कर दू
पर माँ के दिल को क्या लिखू
जिसको हर बार ही तोडा है
तुमने खुद को रुस्वा कर के
छोड़ो लिखती हूँ जब युवा थे
पर क्या लिखू ?लेखनी सिहर गयी
तुम खुद खुद पे शर्मिंदा थे
अब वृद्ध हुए तन्हा ही हो
क्या कोई साथी नहीं मिला
लाखो रूहो को दहला कर भी
जो चलते थे राजा जैसे उनका
अपना कोई भी डर के भी हुआ नहीं
लो खतम हुआ जीवन तेरा
पर शव के साथ न एक कन्धा
ना अश्क़ बहे ना दर्द हुआ
बस शब्द सुना जो गूंज रहा
था बोझ धरा का चला गया
शिखानारी