इश्क़
माना की अहसान बहुत आपने किये
हक़ नहीं है की हम कर सके आपसे गिले
फिर भी ये दिल धड़क के करता है शिकायत
ये पागल हर अहसान को कहता है लगावट
रोये भी मनाया भी मिन्नतें भी की ,कि
अपने इस बदनसीब पे कुछ रहमते है की
लगता है कर बैठा ये गुनाहे मुहब्बत
अब इसको बचाना क्या, साँसे हैं आखिरी
इस को समझने में दिल ने ज़रा देर है कर दी
रुखसती का वक़्त है ,हम चुप ही रहेंगे
वरना हमारे इश्क़ पे भी लोग हसेंगे
शिखानारी
