परछाई
पागल मन ना माने रे
मेरा दुःख ना जाने रे,
बार बार खींचे मोहे
स्वप्नों को सच माने रे,
प्रियतम कब के बिछड़ चुके
भवसागर से पार हुए,
न बाकि परछाई भी
कटु तो है पर सच्चाई भी ,
ये स्वप्नों में ढूंढ उन्हें
रोज़ नया संसार रचे,
फिर लेके टूटे सपने
अहसासों का प्यासा ये,
नदी बनाये अश्क़ो की
खारा जल दिन रात चखे.
शिखा नारी
