परिन्दे
परिंदो को इस तरह पंख फैला देख उड़ते
एक मासूम सी जिंदगी ने एक आरज़ू की थी
आसमां की ओर बड़ी चाहत से देखा था उसने
दिल में बस आरज़ू ये थी ,कभी उड़ पाऊँगी मैं भी
उसकी मुस्कुराती जुस्तजू को तुम ना जाने क्यों
उसकी बेबाक जज़्बों की रोमानी पेशगी समझे
तुम्हारी ग़लतफ़हमी ने उसे इतना सताया की
आरज़ू की उसके पंख बाहर फिर नहीं निकले
इस तरह आसमान की चाह में मासूम सी लड़की
आज एक कदम भी जमी पर बेसहारा चल नहीं पाती
थाम कर हाथ फिर एक अजनबी का आज तक वो
बिना मंजिल के लड़खड़ाती सी जिधर भी मोड़ दो
उस तरफ बेहोश सी बस चली ही जा रही अब तक
ना कोई प्रश्न लब पर है ना कोई शिकवा गिला उसको
शायद अपनी आरज़ू के साथ ही वो भी मर गयी
शिखानारी
