इरादे
ना जाने कितने सागर पार कर मैं इस नदिया में उतरी हूँ
ना घबराना ये आदत है ज़रा से देर डूबूंगी और फिर पार उतरूंगी ,
बता दू तुमको तूफानों अपना रुख बेकार में ना इस तरफ करना
ना जाने कितने बवंडर मुझसे टकरा कर अब तक भटकते है
मैं अपनी हस्ती को हौसलो को पर्वतो सा तैयार करके आयी हूँ
जिंदगी बेतकल्लुफ है ,उलझने मुझसे डरती है,सितमगर दूर रहते है
हौसलो को ना ललकारो मैं नारी हूँ मगर हूँ मैं ,ज्वाला सी
नीर बन के जो बरसोगे तो भाप बन जाउंगी मैं
नियंत्रित करने की कोशिश की तो जलाऊँगी मैं
बड़ी फुर्सत से मैंने पत्थर का ये शातिर दिल बनाया है
अपनी मय्यत पे कई खाली जनाज़े साथ खुद लायी हूँ मैं
शिखानारी (आज कुछ हाहाकारी )
