राज सागर के
कैसे जानू मैं राज सागर के ,
अपनी बाहो में लाखो लहरे छुपा के सोता है
कितने कांटे है ,कितने मोती हैं ,
वो तो चेहरा अपना छुपा के सोता है
कभी तूफ़ान कभी झंझावात,
कभी शांत कभी बस खारा पानी
कभी लहरों का वेग से उठना ,
कभी गर्जन और कभी काली घटा
कभी बिजली कभी बरखा ,
कभी मेघ नीर को खुद सागर तरसा
कभी सूरज का डूबना उसमे ,
कभी साक्षी मिलन के चाँद तारो का
कभी नन्ही सी डूबती कश्ती का,
टूट के फिर मिल जाना किनारो से
मैं तो छोटी सी नदी बस हूँ ,
कभी बहती हूँ सूख जाती हूँ
कभी बारिशो के मौसम में इसी सागर में डूब जाती हूँ।
शिखा नारी
