विश्वास
ये सधवा तन ,अवसादित मन
क्यों अमर्यादित सा धड़क रहा,
अलौकिक सा कैसा अनुभव?
तन शांत और मन, तड़प रहा,
निर्बाधित समय की तेज़ गति
मेरे मर्यादित तन्हा, जीवन को,
तृष्णा क्यों अब, बाधित करती
क्यों अभिलाषित सुख ,सारे ही,
अनुमोदित विधना की, भेंट चढ़े
क्यों संवेदित मेरे, दिल ने ,
खंडित विश्वास, किया मेरा
खुद मेरे ही विचलित, मन ने,
इस तरह हास किया मेरा।
शिखा नारी
https://tramandustrendingcinema.blogspot.in/
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