इकरार
शबनम ना समझो मुझे दरिया हूँ आग का
मुझसे मिल कर तो समंदर सूख जाते है ,
है तमन्ना तुझको जो ख्वाबो मेरी आ
इतनी हिम्मत है तो कर खुद की तू हस्ती को फना ,
जा मेरे दिलबर का चेहरा दिलबर की बाते ला
कर सुलह दिलबर से दिल में, उन का घर है जहाँ सदा ,
अपने लिए कुछ जगह का दिल में इंतज़ाम कर के आ
गर इज़ाज़त दे दे वो तो इश्क़ से इन्साफ कर के आ ,
खुद को फिर मैं मोम कर दू तुझमे ढल जाऊ
मैं बनू निर्मल नदी निश्च्ला बहती हुयी ,
भूल कर दर्द बस सिर्फ ये कहती हुयी
आ सके तो उस नदी की पावन धार बन के आ,
स्वीकार कर नदी की गति ,स्वीकार कर हर अनकही
आ जा सनम स्वीकार अपनी, हार कर के आ
अधूरी सी कहानी में नया ,किरदार बन के आ
मंज़िलो तक के सफर का,इकरार कर के।
