बेदखल
छम से बरस जाऊ रिमझिम ,का गीत गाऊं
ए दिल न यूँ मचल तू तुझे, कैसे अब मनाऊ ,
इस तरहा ना धड़क तू कहि,मैं बहक ना जाऊं
तन्हाइयो से बाहर महफ़िल नई सजाऊँ,
मैं खुद को भूल जाऊँ ,तुझे फिर ताउम्र बद्दुआ दू
तुझे किसी काफिर को कही यूँही , दे ना आऊँ ,
आखिर क्या मामला है तुझे, किस ने क्या कहा है
क्यों इस तरह तू पागल तड़पे, ही जा रहा है ,
वो जो तेज़ रौशनी है अपने ,घर की तो नहीं है
तू गैर की बातो में क्यों खोता ही जा रहा है ,
या खुदा जाने मुझे ये क्या, होता ही जा रहा है
दुश्मन हुआ है दिल ये धोखा ,दिया है उसने ,
एक अजनबी को देखो अपना , लिया है उसने
किसी और के लिए ही अब वह ,धड़क रहा है ,
मेरा आज से ही अपने दिल से ना कोई वास्ता है
अपने ही दिल को मैंने खुद से ,बेदखल किया है।
शिखानारी
