इन्तेहाँ
सुबह से शाम हो जाये हर अरमान खो जाए ,
इंतज़ार की इन्तेहाँ ये हो पलक को चीर कर रख दे
अगर वह तेरी राह और मेरी नज़र के बीच में आये ,
मगर फिर भी ना आओ गर तो, दिल वीरान हो जाए
हसरते मासूम मेरी जैसे कोई तूफान हो जाए,
खुद को मिटा दू या ,आरज़ू का क़त्ल कर दू मैं
मेरा भोलापन वहशत का एक सामान हो जाए ,
ना ज़िद करना कभी इस जूनून को आज़माने की
कही आरज़ू में आज़माने की,जीवन मेंरा ना श्मशान हो जाए।
शिखानारी
शिखानारी
