अरमान
जीवन सम्भले या ना सम्भले ,होगा बोलो अब ,दर्द किसे
अब समझे तो क्या समझे, दिल टूटा तो अब,फर्क किसे,
इस उजड़ी बस्ती में बस एक दीप ही ,काफी था
अब ख़ुद को इस तरह जलाना रोज़ रोज़ यू रहने दो
जब गुलशन ये खिल ना पाये लाखों गयीं बसंत यूँही
अब पतझड़ के मौसम में तुम नये ख़्वाब मत पालो ना
जब गुलशन ये खिल ना पाये लाखों गयीं बसंत यूँही
अब पतझड़ के मौसम में तुम नये ख़्वाब मत पालो ना
अब अश्क़ो की बारिश से नयन भिगोना ,रहने दो
तुमको जो अब समझ सके नहीं मिलेगा ,वो इंसान,
मयखाने में साकी ने अब तोड़ दिया है ,प्यालो को
कैसे तेरी प्यास बुझे अब नहीं जगह ,दिलवालो को ,
यहाँ नहीं बाकी कोई जो अपने गम से, खाली हो
चलो चले विरानो में अब दूर बसें ,श्मशानों में ,
शायद कोई पाकीज़ा रूह समझ सके अरमानो को।
शिखानारी
