NAARI
माथे पे बिंदिया ,निगाहो में जादू
साड़ी बदन पे ,हाथो में कंगन
सिंदूर हो मांग में ,पाँव बिछिया
बताओ ना तुम कौन हो इस धरा पे ?
क्या पहचान है अपना, परिचय कराओ
किसी की हो पत्नी ,बेटी किसी की ,
किसी की हो माँ ,बहन, भाई की भी
मगर नाम अपना कहा है? तुम्हारा,
कहा खो गया खुद पे अभिमान ,सारा
ना भूलो तुम्ही लक्ष्मी ,सरस्वती भी तुम्ही ही ,
वो काली कपाली तुम्ही, भैरवी भी
सभी रूप तुमको अब निभाने, पड़ेंगे ,
कई दर्द तन्हा उठाने, पड़ेंगे
अराजकता ने फिर ललकारा तुमको है,
तुम्हे अस्त्र फिर से उठाने पड़ेंगे
वक्री निगाहे,अभद्र टिप्णियाँ ,
ना अब हम सहेंगे सौन्दर्य,वंदना
कला ज्ञान ही नारी की पहचान, होगी,
सुंदरता की कोई नहीं बात होगी
ना अपमान देंगे ,ना अपमान लेंगे
हम भी पुरुष के बराबर जियेंगे
SHIKHA NAARI
