तमन्ना
अजब है लोगो की भी गलत फहमिया 'नारी'
हमारी आह को भी जो प्रेम का गुंजन, समझते है
हमे नफरत है फूलो से मुहब्बत से ,लगावट से
तो फिर क्यों लोग ना हमको, एक पत्थर समझते हैं
जब आदत सी हो जाये हमे खुद को जलाने की
वह बेसाख्ता हम पर क्यों बरखा से बरसते हैं
कहो तो भीग जाए या कहो तो यूँही जल जाये
ये मसले हैं ख्यालो के ये बनते हैं बिगड़ते हैं
दर्द तो दिल में होता है ,तुम्हे कैसे दिखाए हम
गर जिसे हम चाहते है वो गैरो के दिल में बसते हैं
इतनी सी गुज़ारिश है कम करो रहमते अपनी
ये साज़िश है तमन्ना की चलो बच के निकलते हैं
शिखानारी
