अप्सरा ख्वाबो की
ना शमा ही है महफ़िल में
न परवाने ही है दिखते,
ना रस्के महफ़िल ही सजती है
न जाम से जाम मिलते है,
मगर फिर भी ये अहल -ए -दिल
नशे में बुत से चलते है,
कौन सी मय है जिसके नशे में
हर जिंदगी गुम है ,
ये किस साकी के मयखाने से
सब के सब गुम निकलते है,
सुना है अप्सरा ख्वाबो की
नज़रो से पिलाती है,
होश वो छीन लेती है नज़र
जिससे मिलाती है ,
बाद में हर जवां दिल के
मुक़द्दर बदलते हैं ,
गर उसकी गली गलती से भी
गुज़री कोई हसरत ,
न फिर बचता है दिल यारो
ना हस्ती की ही खबर रहती ,
वो रस्ता दिखा कर
मंज़िलो पे लूट लेती है।
shikhaNAARI
