ज़लज़ले
एक पगडंडी पे चली जाती लिए किस्मत, मेरी
मैं नुमाइश क्या करू आजमाइश में है उल्फत, मेरी
मेरे साजन खो गए है इश्क़ के, बाजार में
लाखो बाशिंदे खड़े है मंज़िलो के, दरमियान
ले के दिल हाथो में और आँखों में कुछ, नियत बुरी
चाहे बस खण्डहर बचे ज़लज़लों के दौर, में
मैं नहीं हूँ वो जो बदल ले इश्क़ की जागीर ,को
हम तो खुश हैं ले के भी अपनी ये किस्मत ,बुरी
किस्मतो के ज़लज़ले गर मिटा भी दे हस्ती, मेरी
रूह से रूह मिल जाएगी बदलेगी ना चाहत, मेरी
shikhanaari
