उतरती धूप
इश्क़ का मौसम और ,उतरती धूप सी उम्रे
क्या इश्क़ की खुदरा कोई, उम्र नहीं होती ,
जब फूल खिल रहे थे भँवरे, बागो की सजावट थे
पतझड़ों के मौसम में लगावट की बाते, अच्छी नहीं लगती ,
ये सिर में एक है लट कुछ चांदी से बालो की
इस मोड़ पे आ कर शरारत, अच्छी नहीं लगती,
पर आँखों में फिर शरारत है, चेहरे पे नूर भी
मुझे जिंदगी के आसार कुछ ,अच्छे नहीं लगते,
गर ऐसे में कोई दिल चुरा ले भी ले तो
मुहब्बत के वादे कोई भी सच्चे नहीं लगते।
shikhanari
