पूर्णिमा
फूलो की पंखुड़ी पे देख कर कतरे ये तबस्सुम के
चांदनी के आंसू मुझे याद आये,
ग्रहण देख कर साजन पे बहुत रोई है
इसने भी शायद मेरी ही तरह,
चैन खोया है नींद खोयी है,
मुस्कुरा के आसमान पर इसने उजाले तो करे पर,
लम्हा लम्हा खुद को जलाती ही रही है
सबको दिखा के मंज़िले,
खुद बेनूर है पर तड़प कर
रौशनी सबके स्वप्नों को दिखाती ही रही है ,
रौशनी सबके स्वप्नों को दिखाती ही रही है ,
लो आज फिर से चाँद पूरा है
चाँद के हर तरफ चांदनी की हसरतो का घेरा है,
खुशनसीब है ये ग्रहण के बाद पूर्णिमा भी आती है.
आज फिर साथ साजन के ये मुस्कुराती है
हमारी जिंदगी की अमावस मगर
कभी भी नहीं मिटती
बस यूँ ही रोज़ सांस आती है सांस जाती है
आज फिर साथ साजन के ये मुस्कुराती है
हमारी जिंदगी की अमावस मगर
कभी भी नहीं मिटती
बस यूँ ही रोज़ सांस आती है सांस जाती है
shikhanari
