चलो बरसात के स्वागत में फिर एक गीत गाते है
कोई कहता है ये बुँदे ,अमृत है मुहब्बत का ,
हम इन्हे इश्क़ के आंसू बताते है
हम इन्हे इश्क़ के आंसू बताते है
चलो अहसास की बारिश में फिर हम डूब जाते है,
भीगी हुयी आँखों से फिर ,उनको बुलाते है
शायद उनका मन भी आज कुछ भीगा हुआ सा है,
इश्क़ के अहसास में डूबा हुआ सा है
मेरा थाम के आंचल वो झूठी पुरानी कसम, फिर से खाते है,
और हम भूल के उनके दिए लाखो ,हज़ारो गम
जान बुझ कर फिर एक धोखा यार, खाते है ,
ना हंसना रंजो गम तुम हमारी ,बेफ़कूफी पर
अरे हम इस बहाने ही तो इस बेवफा का प्यार पाते है।
शिखानारी
शिखानारी
