कच्ची मिटटी का एक घड़ा मन
जैसे एक कठोर सा बर्तन ,
प्रीतम के ऊँचे सुर सुन के
पड़ जाती है इसमें चिटकन ,
विरह के विष को पी कर भी
प्रेम प्याला ये भरता है,
अहसासों से भरा लबालब
जीवन हाला ये भरता है,
मन वीणा की झनकारो से
कम्पित हो कर ,
प्रेम कीर्तन भी करता है
वही कभी धोखो से हताहत,
नफरत के नागो में लिपटा
अपने साजन का खुद,
अपने ही हाथो से गला काट कर
सारी उम्र उसकी ही यादो में,
अपना जीवन श्मशान बना कर
ना जीता है, ना मरता है.
शिखानारी
शिखानारी
