तन्हा
ना तुमको छोड़ पाती हूँ
ना खुद से जोड़ पाती हूँ ,
ये धागा कितना कच्चा है
ना इसको तोड़ पाती हूँ ,
ना तुमसे कोई आशा है
ना कोई आरज़ू मेरी ,
मगर फिर भी तुम्ही से
क्यों ,जीत कर हार जाती हूँ ,
ना रिश्ता बांध पाती हूँ
ना तुमको भूल पाती हूँ,
मगर फिर हमेशा खुद को
तुम्हारे साथ पाती हूँ ,
तेरे साथ होने पर सदा
खुद को भूल जाती हूँ ,
हर लम्हा मगर फिर भी
खुद को क्यों बहुत तन्हा सा पाती हूँ।
