उम्र
उम्र का क्या, ये तो वक़्त की सहेली है
वक़्त की ,अपनी गति से चलती हैं,
हमराही की तलाश से ,फ़ुर्सत जो मिली
देखा पीछे मुड़ के तो मेरी, उम्र ढल गयी,
दिल अब भी वही था और ,हसरतें वहीं
बस ना वो रहे थे वो, ना मैं ही वो रही ,
ये हालात , ये रंजो ग़म, ये शिकवे ,ये शिकायतें
सारी उम्र,दुनिया भर की रिवायते,
ताउम्र नामुराद ख़्वाहिशों के, शिकंजे
अब वक़्त है रूखसत का, मगर,
यक़ीन मानो ,ना ख़ुद को हम समझे
ना हमको वो समझे ,क्यूँ आए थे क्यूँ चल पड़े,
सब प्रशन ही रहें ,हम अब भी वही है
बस फ़क़त लम्हे गुज़र गये.
शिखानारी
शिखानारी
