अपरिपक्व हाथ
ये विज्ञान ये, आविष्कार ये अनियंत्रित जवानी
दीमक है, खोखला कर देगी ये नस्ल को ,
एक चाकू की तरह है जो काट देंगे
आपकी अधपकी फसल को ,
पहले जमानेवालो कुछ रस्मे बनाओ,
नियम बना के घर में सामान ये लाओ
एक बच्चे के हाथो में ,क़त्ल का दे के खिलौना ,
भगवान् के घर अंधेर ना आवाज़ लगाओ
नस्ल के भविष्य की यूँ ना दो कुर्बानी ,
भारत के नसीब पर कुछ तो हो मेहरबानी
अब वक़्त किसे पूछे कौन कहां ? कौन नहीं है?,
दुनिया तो अब फ़ोन के चक्कर में पड़ी है
अब 'सॉरी' और 'लव यू' ही तालीम बने है ,
अब बुद्धिहीन भी यहाँ शौकीन बने है
हर रस्मो रिवाजो की सब तौहीन बने है ,
हर शख्स को अब सिर्फ बस 'नेट' पे यकीं है
घर के बड़ो के अनुभव सब बेकार पड़े है ,
इज़्ज़त या मुहब्बत या क़त्ल करने की युक्ति
कैसे किसी रिश्ते से मिल जाएगी मुक्ति ,
हर फन में माहिर यहाँ, अब लोग बड़े है
एहसास ,वफ़ा ,इंतज़ार सब फक्त, बस है दिल्लगी ,
एक पल में रिश्ते टूटे, नए रोज़ बने है
सब से गुज़ारिश है ,"ओ मेरे दोस्तों ! ,
पहले दिखाओ रास्ता मंज़िल का पता दो
फिर अपरिपक्व हाथ में तुम फ़ोन दिला दो ,
अपने ही घर की नीव हिलने से बचा लो
भारत की तक़दीर उजड़ने से बचा लो।
शिखानारी
शिखानारी
