एक शाम, कहो तो घर घर आऊँ
अहसासों के मोती के गहनों से रूह सजा ,
मैँ रंग-बिरंगी यादो के फूलो से, खुद को महका
आँखों में भर फिर टूटे सपनो को काजल सा, नयन सजा लाऊ ,
बोलो ना साजन एक बार सही क्या वापस मैँ ,फिर घर आऊँ ?
तुमको छोड़ा तो ना सोचा होगा अब रूह का नीड कहाँ
सोचा तुम को भी प्यार मेरे ,होगा कैसे फिर चैन वहां ,
जब मुझसे सजना खेल चुके फिर एक नया खिलौना ,ले आये
अब नहीं कहीं भी जगह मेरी ,कैसे सजना हम घर आये ,
गर नदी बहा दे अश्को की तब भी, वो बाढ ना आएगी
जो मेरी जगह नुझे दे दे ऐसी ,मझधार ना आएगी ,
खुद मैंने तुमको छोड़ा था तुमसे मैँ रार करुं ,पर क्या
खुद प्यार को झूठा सिद्ध किया, रब से तक़रार करू मैँ क्या?
बस अब नफरत के दामन में तन्हां ,यूँही मैं जीती हूँ
बीते लम्हो की प्यार भरी, बातो में उलझी ,रहती हूँ ,
एक भूल ने तनहा कर डाला तुमको भी और मुझको भी ,
टूटे सपनो की चादर से ढ़क तन को भी, मैं वस्त्रहीन
अपनी इज़्ज़त के टुकड़ों को नाकाम सी ,ढ़कती रहती हूं
न जीती हूँ ना मरती हूँ ,बस तारे गिनती रहती हूँ।
शिखानारी
