रूह
जीवन खुली किताब है ये ,सोचती रही
पर चाहतों में तेरी एक राज़ बन गयी,
माथे पे सजूंगी तेरे चन्दन सी सुवासित
जल के तेरी नफरतो से सिर्फ मै , राख बन गयी,
तेरे ही तसव्वुर में मुझे बसे रहने की चाह थी
पर बेवजाह मैँ रोज का अख़बार बन गयी ,
भरी सुराही पास रख अनजान बन गयी
हाथो में जाम ले के भी मैँ इंतज़ार में तेरे ,
प्यासी रही ता उम्र अतृप्त प्यास बन गयी
दिल तोड़ के अपना खुद अपने ही हाथ से ,
बेखबर बदनामी का एक इश्तेहार बन गयी
इन आंसुओ का बेवजह इतिहास बन गयी,
कोई नहीं है दूर तक अब मेरी क़ब्र पर
मैँ हश्र की नमाज़ का अल्फाज़ बन गयी,
अपनी ही कब्र पर फूलो को सजा कर
पगली सी इंतज़ार में तेरे,
मर कर भी भटकती रही तुझे पाने की धुन मे
मैँ बन के एक अतृप्त रूह ,
मर कर भी भटकती रही तुझे पाने की धुन मे
मैँ बन के एक अतृप्त रूह ,
दुनिया में सारी डर का एक ऐहसास बन गयी
शिखानारी .
शिखानारी .
