सजा

लो दे दी मैंने ",खुद ' को फिर एक सजा
खुद ही खुद " को मजबूर किया ,
खुद " खुद को सबसे दूर किया
खुद" ही अपने पर काट दिये ,
और उड़ने से मजबूर किया
खुद" ही गैरो के साथ रही ,
खुद "अपने घर का त्याग किया
खुद" ही तो मैंने जहर पिया ,
फिर क्यों? सबको इलज़ाम दिया ?
तुम बाहें खोले खड़े रहे,
और हमने रस्ता मोड़ दिया
तुम! जब भी आये पास मेरे,
मैंने नफरत का कंबल ओढ़ लिया
तुमने फूलो से दामन भरना चाहा,
मैंने शर्मो का दामन छोड़ दिया
तुम ने चाहा एक नाम दिया ,
और मैंने तुमको रुसवा कर के
यूँही बेकद्री से छोड़ दिया ,
अब याद बहुत तुम आते हो !
पर नज़र नहीं आते चंदा !,
कहते है लोग, मेरे साजन !ने
"कफन "दर्द का ओढ़ लिया
शिखानारी
शिखानारी