रिश्ता बिना अहसास का,
ये दर्द है कुछ खास सा,
ना जिंदगी इसमें कोई,
ना ही है कुछ अरदास सा,
बस बंधनो की दास्तान,
और उलझनों की रस्सियाँ,
उलझी हुयी, मैँ भी यहाँ,
उलझी हुयी सी सिसकियाँ,
है मंजिले ,ऒझल यहॉ
और रास्तो पर किरचिया,
मंजिल जहा ,बस मौत है
और बेबसी है हमसफ़र,
कुछ प्रशन है ,अनुत्तरित
दे दो मुझे उत्तर ज़रा,
मैँ अपुर्ण हूँ या पुर्णता
रिश्तों की कोई भूल हूँ ?
विधवा हूँ ,या अनुचारीका ?
एक साध्वा ,या व्यभचारिका,
तुम कौन हो ?साथी मेरे
तुम पूर्णता या एक सजा.
शिखानारी
शिखानारी
