इश्क़ समुन्दर
कभी आग भी बन जाता है ,पानी
कभी बर्फ का समँदर, जलाता भी है,
दरिया वफाओ का भी, सूखता है
कभी बेनूर आँखों में ख्वाब ,आता भी है,
कभी जिनको को शिद्दत से चाहा था, हमने
उन्ही को मेरा दिल जलाता ,भी है,
चलो तुम सजालो नई महफिले, अब
फर्क क्या? गर, दम हमारा निकल जाता भी है,
वही तंजे तरकश, वही नज़रे खंजर,
वॉर सीधा दर्दे दिल पे ,आता भी है,
मगर इश्क़े किस्मत की कारीगरी है
की मजनू लैला को ,बुलाता ही है ,
समाजो रिवाज़ो सुनो ,हम नवाज़ो
हुआ फायदा क्या? तुम्हारे सितम का,
जो ठान लेगा हुस्न, राँझा से मिलना
तो खुदा खुद उन्हें फिर, मिलता ही है,
जन्म और मरण सिर्फ ,जिस्मो के जेवर
रूह से रूह का मिलना, कौन रोक पता ही है
शिखानारी
शिखानारी
