कैसे रहे बहार सदा कैसे ना पतझड़ आये,
कैसे कोई समझाए कैसे आंसू ना आये ,
ये तो प्रकृति रीति है ये तो बदल नहीं पाए
जब जब जिसको जाना है कोई रोक नहीं पाए ,
बीज से पौधा पौधे से,पेड़ से छाया फिर फल फूल,
अंतिम गति फिर आ जाये हरे आक मुरझा जाये ,
कितना भी पानी डालो फूल नहीं फिर खिल पाए
शाश्वत सत्य यही है ,प्राण पक्षी जब उड़ जाए,
सोने का पिंजरा हो देह या खाने को मोती दाने ,
उड़ एक बार फिर ना भरमाये देह पिंजरे में ना आये ,
ना संगी साथी कोई ना दिया बाती कोई ,
न तम ना कोई उजियारा ना सुख दुःख का अँधियारा
बस अनंत निराकार शून्य ,परम शांति का गलियारा,
अग्नि ही अंतिम पड़ाव है हम सबका
अग्नि में सब जल जाए,
अग्नि ही अंतिम पड़ाव है हम सबका
अग्नि में सब जल जाए,
बस मोक्ष ही मंज़िल है और, अंत भी निश्चित है ,
फिर भी सत्य ये जीवन का जिस से, हर मन परिचित है
मंज़िल पर आते ही क्यों देह प्रेम में पड़ जाए ,
छोड़ देह को जाने को क्यों ये नहीं सवंर पाए
हँसते हँसते क्यों कोई परम् गति नहीं पाए ?
शिखानारी
शिखानारी
