नाजुक डाली
मेरी दुनिया खाक! बना कर तुम भी तन्हा रहो सवाली ,
मैंने तुमको कुछ हक़ दे कर खुद को आखिर मार ही डाला,
तुमने छू कर पाक बदन को "खाक" हवन की "राख" बना दी ,
कुछ लम्हो में मैं भी बहकी साँसों ने एक आग लगा दी ,
पी तो नही सुराही! हमने पर साकी ने प्यास जगा दी ,
खुद से शर्मिंदाहूँ इतनी खुद से नज़र मिलाऊ कैसे?
नाज़ किया करते थे जिस पर हल्की कर वो बात उड़ा दी ,
मेरे हर विश्वास को तोडा तन्हाई का किया बहाना ,
मैंने अपने प्यार की लोगो खुद ही, देखो हंसी उड़ा दी ,
उस काफिर ने मुझ काफिर को देखो मेरी, जात बता दी,
खुद से ही हम रूठ गए है खुद से बन्धन टूट गए है ,
उन बहके लम्हो ने खुद मेरी खुद से पहचान मिटा दी ,
खुद से हूँ अजनबी इस तरह देखो, रब ने खूब सजा दी...
शिखानारी
शिखानारी
