अतृप्त आशाये
इच्छाये अनन्त ना हो
आशाये अतृप्त ना हो ,
है ऐसी कोई विधा नही
जहाँ जीवन हो बदलाव नही ,
मन की चंचलता रुक जाये
शाखों पर अब गुल ना आये ,
आँखों में स्वप्न ना हो कोई
तन जीवित और मन मर जाये,
हम कोर उठा कर आँचल का
नयनो से आंसू चुरा रहे ,
वो बात कहे कैसे उनसे
जिन पर खुद हमको ही ,
ऐतबार ना हो
एक बून्द नई शबनम की है ,
एक कली अभी अधखिली सी है
सौ बात हुयी मेरी उनसे ,
एक बात मगर, अनकही सी है।
शिखानारी
शिखानारी
