अनुबन्ध
जैसे प्यासे सागर ने खुद का, नीर पिया ,
खुद को इतना झुकाया खुद को ही पाने के लिए
दिल तक तो ना कभी पहुँच पाए ,
दिल तक तो ना कभी पहुँच पाए ,
पैरो के निशानों को ठोकरो को ही जिंदगी जाना,
हम दिल की आवाज़ कहाँ सुन पाए ,
हम दिल की आवाज़ कहाँ सुन पाए ,
मुझको गैरो की पनाहो में इस तरह डाला
की उस अल्लाह! को सज़दा भी न कर पाए,
हारे नहीं पर हम जिंदगी से
जिंदगी खुद की यूँ रंगीन करी ,
मधुशाला दर्द की दिल में खोली
और यादो को बनाया साकी,
हारे नहीं पर हम जिंदगी से
जिंदगी खुद की यूँ रंगीन करी ,
मधुशाला दर्द की दिल में खोली
और यादो को बनाया साकी,
मेरी महफ़िलो में अब दर्द के जाम चलते है
यहाँ मेरे स्वप्नों का रक्स होता है,
परवाने हसरतो के जलते है
परवाने हसरतो के जलते है
मैं रात दिन नशे में इतना चूर रहती हूँ,
की होशवाले सारे तमाम मेरी ख़ुशी से जलते हैं।
शिखानारी
शिखानारी
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