नृत्यकी!
मैं नृत्यकी! हूँ ,
वक़्त की धारा पे बेसुध नाचती हूँ
पैरो में, घुंघरू हैं मेरे इन रिवाज़ों के ,
हाथ में चूड़ी है मेरे इन समाजो की
कच्चे! धागों पर वफ़ा के पैर रख कर ,
सिर पे इज़्ज़त के घड़े का भार रख कर झूमती हूँ
संतुलन छुटे ना इस का ध्यान रख कर,
बारिशे हो अश्क की या धूप तन्ज़ की
मैं नृत्यकी !नाचती हूँ तालो पे वक़्त की ,
मैं गिर गयी तो फिर उठूंगी
उठ के लोगो फिर गिरूँगी,
भूलो ना मैं नारी हूँ इसी "भारतवर्ष" की
ये सन्तुलन टूटे नही ये ताल अब टूटे नही ,
टूटी हुयी ये ताल ही सृष्टि है रन्ज की
मैं नृत्यकी रूप हूँ स्वयं ही उस रचनाकार की ,
देती जन्म खुद सृष्टि को फिर उसको पलती
कोई भी हो तूफ़ान मैं एक सुर में नाचती ,
ना तोड़ती ये सन्तुलन ना मर्यादा लाँघती
सब के गम का भार ले कर खुशियो के हार दे कर ,
मैं नृत्यकी हर हाल में बस हर वक़्त नाचती
और हर वक़्त गम को भी खुशिया बांटती है।
शिखानारी
