मक्कार
हम देखते है बदले किस्से इन समाजो के,
खुद मंजनू के हाथो में लैला के कटे सिर है
हीरों ने जहर दे कर खुद ही राँझों को सुलाया है ,
इश्क़ के हाथो में अब धोखो का ख़ंजर है
खुदगर्ज़ी का नशा यारो इस नस्ल पे छाया है,
है जुर्म इश्क़ करना है ,पाप वफ़ा करना
कसमो को निभाना और उल्फत है, गुनाह करना ,
टुकड़ो में टूट कर रोता था सिसकता था
वह शीशा नही है अब दिल श्रगाल, (सियार)बन गया है ,
मासूम नही अब ये ,अब ये मक्कार बन गया है
रोता नही है अब ये रणनीति ,बनाता है ,
अपने शिकार को ये वादों से फसाता है
ऐतबार का कत्ल कर ये बस, जीत के ही आता है.
शिखानारी
