वक़्त की रेत
लौ बुझते दिए की और मुट्ठी से फिसलती वक़्त की रेत
अनुभव तो बहुत है और सफर अब तक है बाकी ,
बड़ी अद्भुत कहानी ये मेरी जिंदगी भी
न मयखाने में मदिरा ना मयखाने में साकी ,
कभी फूलो के गुलशन सा जो था ये दामन
कभी अग्नि की वर्षा वहाँ पर भी हुयी है,
कभी सूरज और चंदा चमकते थे जहाँ
वहाँ रौशनी की किरण तक भी नही है,
कभी शहनाई की सरगम बजी थी
कभी हर ख़ुशी की मय्यत उठी है ,
कभी मुस्कुराहट कभी झटपटाहट
कई अरमानो की वह बोली लगी है,
प्यार की बात करना भी गुनाह था जहां पर
वहाँ कभी विधवा की भी डोली उठी है ,
माँ !हो के भी कभी मैं माँ ना !बन सकी
खुद की औलाद के मैं ना सीने से लगी,
मगर उनके लिए ही मैं दूर उनसे हुयी
गैर के अंश को मैं पालती ही रही ,
ना रही इस जहाँ की मैं ना ही ,खुदा! की हुयी
सब समझी नही पर ,कुछ समझ भी गयी,
ये है किस्मत !की ही मेरी सारी गड़बड़ी
ये है मेरे 'कृष्णा "की कारीगरी
शिखानारी
अनुभव तो बहुत है और सफर अब तक है बाकी ,
बड़ी अद्भुत कहानी ये मेरी जिंदगी भी
न मयखाने में मदिरा ना मयखाने में साकी ,
कभी फूलो के गुलशन सा जो था ये दामन
कभी अग्नि की वर्षा वहाँ पर भी हुयी है,
कभी सूरज और चंदा चमकते थे जहाँ
वहाँ रौशनी की किरण तक भी नही है,
कभी शहनाई की सरगम बजी थी
कभी हर ख़ुशी की मय्यत उठी है ,
कभी मुस्कुराहट कभी झटपटाहट
कई अरमानो की वह बोली लगी है,
प्यार की बात करना भी गुनाह था जहां पर
वहाँ कभी विधवा की भी डोली उठी है ,
माँ !हो के भी कभी मैं माँ ना !बन सकी
खुद की औलाद के मैं ना सीने से लगी,
मगर उनके लिए ही मैं दूर उनसे हुयी
गैर के अंश को मैं पालती ही रही ,
ना रही इस जहाँ की मैं ना ही ,खुदा! की हुयी
सब समझी नही पर ,कुछ समझ भी गयी,
ये है किस्मत !की ही मेरी सारी गड़बड़ी
ये है मेरे 'कृष्णा "की कारीगरी
शिखानारी
