सबाबे हज!
तुझको को रख कर तस्स्वुर में ग़ज़ल कहती हूँ ,
मैं निर्दोष इस चेहरे को कमल कहती हूँ
मेरे जज़्बात तो स्याही से दिल में रहते है,
तेरी आंखों को मैं जज़्बो की कलम कहती हूँ,
अपने जीवन को बनाया है एक कोरा पन्ना
अश्क़ो को सजाया इन पर फूलो की तरह ,
तेरे थर्राते लरजते हुए होंठो की कसम
तेरे हर लफ्ज को मौला का करम कहती हूँ,
बड़ी बेगानी सी लगने लगी दुनिया तुझे पा कर
तेरे साथ अब, अपने घर को महल कहती हूँ ,
मेरे शहज़ादे मेरे गुरुर मेरी इश्क़े वफ़ा
तेरे कदमो को मैं अल्लाह! का मेंहर कहती हूँ ,
तेरी बाहो में छुप जाती हू चुप चाप कभी
कभी तेरे साथ को सबाबे हज! का असर कहती हूँ .
